Monday , 30 November 2020
Home - हिन्दू योद्धा - Rani Avantibai : रामगढ़ की रानी जिसने अंग्रेजो की ईंट से ईंट बजा दी
Rani Avantibai
Rani Avantibai

Rani Avantibai : रामगढ़ की रानी जिसने अंग्रेजो की ईंट से ईंट बजा दी

रामगढ़ पर अंग्रेजों का कब्जा

मार्च, 1858 के दूसरे  सप्ताह तक  रामगढ़  में सेनानियों एवं अंग्रेजी सेना में संघर्ष चलता रहा।सेनानियों की संख्या में निरंतर कमी आ रही थी।किले की दीवारें भी रह-रह कर ध्वस्त होती गई। अत: रानी अवन्ती बाई अंग्रेजी सेना का घेरा तोड़ देवहार गढ़ पहुंच गई राम गढ़ के शेष सिपाहियों ने एक सप्ताह तक अंग्रेजी सेना को रोक कर रखा | अंत में वाडिंगटन ने रामगढ़ के रानी के आवास पर कब्जा कर के अपना मुख्यालय बना लिया। 09 अप्रैल को सुबह  07 बजे बड़ी संख्या में सेनानी पहाड़ी के उत्तरी सिरे से रामगढ़ में प्रवेश करने के लिए तीन मार्गों से होते हुए आगे बढ़े।वाडिंगटन चार जम्बू कों और पुलिस टुकड़ी के साथ सेनानियों के समक्ष मोर्चा खोला, लेकिन धोखा देने की नीयत से लड़े बिना ही अपनी खाईयों की ओर वापस लौट आया और सेनानियों से हारने का दिखावा किया सेनानी अंग्रेजों की चाल समझ नहीं पाए और विजय उल्लास मनाते हुए पहाड़ी से नीचे उतर आए।मौके का फायदा उठाकर अंग्रेजोंने सेनानियों पर गोलियां चलाई।वाडिंगटन यही चाहता था कि सेनानी पहाड़ी से निकल कर खुलेक्षेत्र  में आजाएं  (जंगल—पहाड़ी क्षेत्र सेनानियों के लिए सुरक्षित स्थान था)।अंग्रेजों से लड़ते—लड़ते सेनानी रामगढ़ कस्बे के उत्तर में स्थित कन्दराओं की ओर चले गए। अप्रैल, 1858 में शाह पुरा विजय सिंह के ससुर शिव बख्श के यहाँ से अंग्रेजों ने तिजोरी, कुछ संग्राम से जुड़े दस्तावेज और बन्दूकें जब्त की 

अंग्रेजों की शर्त सेनानियों ने किया नजर अंदाज

18 जून, 1858 को सोहागपुर के किला पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया।एक मध्यस्थता में अंग्रेजों ने सेनानियों के सामने शर्त रखी कि वे 19 जून की सुबह 08 बजे तक आत्म समर्पण कर दें।उनके साथियों को परेशान नहीं किया जाएगा।वहीं, सेनानियों को फांसी के बदले अन्य सजा मिलेगी और जीवन दान भी दिया जाएगा।लेकिन सेनानियों ने बात नहीं मानी और 19 जून को किला खाली कर के रीवा की ओ रकूच कर गये। वाडिंगटन के मुताबिक, जुलाई, 1858 में वाडिंगटन को रामगढ़ की रानी अवन्ती बाई और विजय सिंह ने प्रार्थना पत्र व संदेश भेजा।जिस में पत्र के साथ एक रुपया भी था, जिसका तात्पर्य था कि वे समर्पण करना चाहते हैं।जिसके बाद वह 30 जुलाई, 1858 को अपने कमिश्नर को रिपोर्ट भेजा और मार्ग दर्शन चाहा।जब कि  25 अगस्त, 1858 तक एक भी सेनानी ने समर्पण नहीं किया। 13 नवंबर, 1858 को वाडिंगटन ने कमिश्नर को लिखा कि ”इंग्लैंड की महारानी द्वारा जारी क्षमा की घोषणा की प्रति रामगढ़ के सेनानियों और अन्य मालगुजारों को भेज दी गयी महारानी की घोषणा के प्रत्युत्तर में रानी अवन्ती बाई ने अपना इलाका वापस पाने के बारे में पूछा।सरकारी संदेश वाहक के माध्यम से इंग्लैंड की महारानी को उन्होंने अवगत कराया कि ”अगर वाडिंगटन मण्डला जाएगा तो वह रामगढ़ आएंगी।

Related Post : रानी लक्ष्मी बाई के शव की रक्षा हेतु बलिदान हुए थे 745 हिन्दू साधू

रानीअवन्ती बाई केआत्मसमर्पण का कहीं कोई वर्णन नहीं

13 नवम्बर, 1858 के इस पत्र के बाद रामगढ़ की रानी का कोई उल्लेख नहीं मिलता है।जनवरी, 1859 के मध्य में वाडिंगटन ने रामगढ़ में अपना शिविर स्थापित किया।हालांकि रामगढ़ की रानी के द्वारा समर्पण किये जाने का उल्लेख अंग्रेजी दस्तावेजों में भी नहीं है।वहीं, 09 अप्रैल, 1858 से लेकर 13 नवम्बर, 1858 तक रानी के जीवित होने के प्रमाण मिलते हैं।रानी के बलिदान की तिथि का जिक्र गैजेटियर में भी नहीं है।ब्रिटिश सरकार ने अवन्ती बाई के दोनों सेनानी पुत्रों अमान सिंह और शेर सिंह से रामगढ़ तालुका ले लिया।संग्राम को दबाने में सहायता करने वाले रीवा महाराजा को ब्रिटिश सरकार ने   सोहागपुर तालुका भेंट कर दी।संग्राम करने वाले गांवों पर  20 प्रतिशत ज्यादा लगान घोषित कर दिया गया।इस राशि को ‘आय हक पर वरिश ‘ कही जाती थी।

Rani Avantibai Of Ramgarh

संदर्भ—

मध्यांचलकेविस्मृतसूरमा (लेखकडॉं. सुरेशमिश्र)

Rani Avantibai Lodhi of Ramgarh – 1857 (Dr. Suresh Mishra

 


आशा है , आप के लिए हमारे लेख ज्ञानवर्धक होंगे , हमारी कलम की ताकत को बल देने के लिए ! कृपया सहयोग करें

यह भी पढ़ें

Raja Suhaldev  and Battle of Bahraich

ग़ज़नी के भतीजे को भारत से खदेड़ने की गौरवशाली गाथा : Raja Suheldev

Raja Suhaldev  and Battle of Bahraich : राजा सुहेलदेव पासी का अपने समय में इतना …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *