Tuesday , 1 December 2020
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Khashaba Dadasaheb Jadhav
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Khashaba Dadasaheb Jadhav : भारत को पहला ओलिंपिक मेडल दिलाने वाले पहलवान जिन्हें भुला दिया गए

 Khashaba Dadasaheb Jadhav  खिलाड़ी एक देश की शान होते हैं। उनकी जीत से एक राष्ट्र का गर्व बढ़ता है, लेकिन यदि उसी खिलाड़ी को अपनी सरकार का समर्थन न मिल पाए तो ?

हर चार साल में होने वाले ओलिंपिक खेल किसी खिलाड़ी और देश के लिए कितने अहम होते हैं

इस बात से कोई भी अनजान नहीं है. हर देश के खिलाड़ी इसमें पदक जीतने के लिए अपने दिन रात एक कर देते हैं.

ऐसे ही एक खिलाड़ी थे खाशाबा दादासाहेब जाधव जिन्होंने आजाद भारत को Khashaba Dadasaheb Jadhav

पहला इंडिविजुअल ओलिंपिक मेडल दिलाया लेकिन आज कोई उनका नाम तक नहीं जानता!

तो चलिए क्यों न इतिहास के पन्नों से एक बार फिर ओलंपिक मेडलिस्ट जाधव की यादों को जिंदा किया जाए–

बचपन में ही जोड़ लिया था कुश्ती संग नाता

जाधव का जन्म महाराष्ट्र के एक गाँव गोलेश्वर में हुआ था. कहते हैं कि पीढ़ियों से

उनके परिवार में कुश्ती सीखने का चलन है इसलिए छोटी उम्र से ही जाधव को भी इसमें आना पड़ा.

जाधव के लिए कुश्ती सिर्फ एक खेल नहीं बल्कि एक एहसास था. माना जाता है कि वैसे तो जाधव स्विमिंग,

वेटलिफ्टिंग, जिमनास्टिक जैसे खेलों में भी काफी अच्छे थे… लेकिन उनकी असली जान थी कुश्ती.

कहते हैं कि जाधव बहुत अमीर घराने से नहीं थे. बहुत मुश्किल से उनका महीने का गुजारा चलता था,

लेकिन फिर भी उनके परिवार ने कभी भी उन्हें कुश्ती करने से नहीं रोका. जाधव पूरी लगन से कुश्ती सीखते रहे.

ऐसा माना जाता है कि आठ साल की उम्र में जाधव ने अपना पहला मुकाबला खेला.

उस मुकाबले के बारे में कुछ यूँ कहा जाता है कि जाधव ने वहां के कुश्ती चैम्पियन को हरा दिया था…

वह भी दो मिनट के अंदर! Khashaba Dadasaheb Jadhav

कहते हैं कि उस दिन के बाद से जाधव ने यह निश्चय कर लिया कि वह एक प्रोफेशनल रेसलर बनके रहेंगे.

वह कड़ी मेहनत करने लगे… कुश्ती में आगे बढ़ने के लिए.

1948 में दुनिया ने देखा, कोई भारतीय पहलवान आया है

जाधव के पिता दादासाहेब जाधव जाने-माने पहलवान थे. ऐसे में बचपन से ही उनको कुश्ती का चस्का लग गया था.

खूब लड़े-भिड़े भी. इस बीच देश आजाद हुआ और बारी आई विरासत में मिले हुनर को आजमाने की.

हौंक के मेहनत की जाधव ने. 1948 में लंदन ओलंपिक की बारी आई तो जाधव को समझ आया कि

मेहनत के साथ पैसा भी चाहिए. और पैसा था नहीं. खैर, हाथ-पैर मारे तो पैसे का इंतजाम हो गया.

कुछ पैसा कोल्हापुर के महाराज ने दिया तो कुछ पैसे का इंतजाम गांव वालों ने किया.

जाधव भइया ने भी इन पैसों की कीमत खूब चुकाई. 52 किलो की कैटेगरी में वो

लंदन ओलंपिक में छठे नंबर पर आए. उनके देसी मगर फुर्तीले दांवपेच देखकर ही उन्हें

अमेरिका के पूर्व कुश्ती विश्व चैंपियन रईस गार्डनर ने कोचिंग भी दी थी. वो लंदन से मैडल भले ना ला पाए हों,

मगर अगली बार के लिए अपनी दावेदारी जरूर ठोक दी थी.

जब जाधव ने दिलाया पहला इंडिविजुअल ओलिंपिक मेडल…

लंदन ओलिंपिक की हार जाधव के दिलो-दिमाग से गई नहीं थी. वह नहीं भूले थे कि आखिर उनका लक्ष्य क्या है!

कहते हैं कि अगले ओलिंपिक के लिए उन्होंने चार साल तक कड़ा परिश्रम किया.

1952 में जाधव के सामने एक बार फिर से ओलिंपिक में जाने का मौका आया लेकिन एक बार फिर

उनके सामने पैसों की परेशानी भी आ गई.

कहते हैं फिर उन्हें कोल्हापुर के महाराजा की तरफ से कोई मदद नहीं मिली और न ही सरकार की तरफ से.

वह जगह-जगह लोगों के पास जाते रहे पैसे इकठ्ठा करने के लिए लेकिन उन्हें पैसे नहीं मिले.

जब जाधव को लगा कि उनका सपना अब अधूरा रह जाएगा तब उनके कॉलेज के प्रिंसिपल

उनकी मदद करने सामने आए. माना जाता है उन्हें जाधव पर विश्वास था जिसके लिए उन्होंने

7000 रूपए में अपना घर गिरवी रखा ताकि जाधव ओलिंपिक के लिए फिनलैंड जा सकें.

जाधव जेब में पैसे और आँखों में सपने लिए ओलिंपिक खेलने पहुंचे.

उन्होंने वहां कई इंटरनेशनल खिलाडियों को पस्त कर दिया था. कहते हैं कि जाधव ने उस समय

एक फाइट लड़ी ही थी कि उनकी अगली फाइट रूस के पहलवान से थी.

माना जाता है उस समय के नियमों के हिसाब से दो फाइट्स के बीच 30 मिनट का फर्क होना चाहिए

लेकिन जाधव के अलावा वहां भारत से कोई और नहीं था… इसलिए जाधव को तुरंत ही वापस लड़ना पड़ा.

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कहते हैं वह थके हुए थे लेकिन फिर भी लड़े और एक घमासान मुकाबला करने के बाद वह हार गए.

अपनी हार के कारण उन्होंने फाइनल में जाने का चांस भी खो दिया था.

इन सबके बावजूद वह कांस्य पदक हासिल करने में कामयाब रहे.

वह आजाद भारत के पहले ऐसे भारतीय बने जो अकेले किसी खेल में मेडल लाया हो.

जाधव के इस कारनामे ने इतिहास के पन्नों में उनका नाम दर्ज करवा दिया.

सरकार भूली पर गांव वालों ने हमेशा रखा सिर आंखों पर

15 जनवरी, 1926. इसी दिन जाधव का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले के एक छोटे से गांव गोलेश्वर में हुआ था.

गोलेश्वर के लोगों के जाधव हमेशा चहेते रहे. चाहे ओलंपिक में उनके जाने के लिए

चंदा इकट्ठा करने की बात हो या उनका हौसला बढ़ाने की बात हो. जाधव जब ओलंपिक से

देश के लिए एकल मुकाबले में पहला पदक लेकर लौटे तो सरकार ने उन्हें कोई तवज्जो नहीं दी.

सबकी नजरें ओलंपिक में उसी साल गोल्ड जीतकर लौटी हॉकी टीम पर थी.

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मगर गोलेश्वर यानी उनका गांव उन्हें नहीं भूला. ऐसा भौकाली स्वागत किया जो जाधव कभी ना भूलने वाले थे.

गांव के लोग 151 बैलगाड़ियों से जाधव का स्वागत करने पहुंचे.

ढोल-नगाड़ों के साथ आए लोग नाचते-गाते हुए अपने इस लाल को स्टेशन से गांव ले गए.

यादगार जश्न मनाने वाले ये गांववाले जाधव को उनके मरने के बाद भी नहीं भूले.

14 अगस्त, 1984 को उनके निधन के बाद गांववालों ने गांव में उनकी मूर्ति लगवा जाधव को अमर कर दिया.

जाधव ने 30 साल महाराष्ट्र पुलिस को भी अपनी सेवाएं दीं.

Source : Wikipedia 

 


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